कामयाबी जिंदा रहने का नाम नहीं बल्कि हक़ पर चलते हुए मज़लूमों के लिए जान निछावर करने का नाम है.................
मेरे कातिलों से हाथ मिलाया तुमने
कितनी हद़ तक खुद को गिराया तुमने
बात ईमान की सर-बुलंदी की थी
क्यों कर ग़ैरों को अपना बनाया तुमने ....
ऊपर वाले ने इस दुनिया को बहुत ही खूबसूरत बनाया था लेकिन हम इंसानों ने इसे जहन्नुम बना दिया......
जिंदगी उतनी ही बेवफ़ा है जितना कि तुम........
किसी पर ज़ुल्म उतना ही करो जितना कि तुम सह सको क्योंकि वक्त पलटते देर नहीं लगता.......
तुम्हें इस बात का घमंड है कि तुम ज़िन्दगी ज़ी रहे हो, और उन्हें इस बात का गुरूर है कि हक़ की ख़ातिर मर रहें हैं..............
ज़ालिमों के साथ वो लोग हैं जो दुनिया में कामयाबी ढूंढते हैं और मज़लूमों के साथ वे लोग हैं जो आख़रत में कामयाबी चाहते हैं.......
ज़ालिम ज़ुल्म अकेला नहीं करता बल्कि उसके इस काम के सहयोगी वो लोग हैं जो ज़ुल्म होता हुआ देखते हैं लेकिन करते कुछ नहीं..........
कैसे मैं कहूं मैं अपने जज़्बात जब मैं मुर्दा हूँ
कैसे बोलूं मैं सच , कैसे बोलूं मैं हक़ जब मैं मुर्दा हूँ ।
बस इतना सा एहसान हो जाए या रब़
मैं मर जाऊँ और जिंदों में मेरा नाम हो जाए या रब़ ।
एक इंसान दूसरे इंसान पर ज़ुल्म करता है क्योंकि तीसरा खामोशी के साथ उसे ऐसा करते देखता है.....
इंसान की अकड़ उसकी अक्ल को खत्म कर देती है.....….
उम्मीद करतीं हूं कि "बोल की लफ्ज़ आज़ाद हैं मेरे"आर्टिकल आपको पसंद आया होगा ये सिर्फ कुछ शब्द नहीं हैं बल्कि मेरे अंदर के वे अहसास हैं जिसे मैंने शब्दों का रूप देकर आपके सामने बंया किया है
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